Monday, June 3

तुम्हारा आना .......



तुम कौन हो
पूंछता है एक
कोलम्बस
जब वो खोलता है
अपनी नन्हीं-नन्हीं आंखें
मैं उसकी सत्य अन्विज्ञता पर
प्रफुल्लित हो जाता हूँ
आँखों में  अनगिनित  सपने संजोयें
वो मुझे देखता है
मुस्कुराने की कोशिश करता है
और शर्मा जाता है
मैं सोचता हूँ
ये बेटी क्यों है ?
काश बेटा होती ...
तभी शर्मा जी की आवाज़ गूंजती है
बधाई भाई  साहब
लक्ष्मी आयी है ..
मैं तपाक  से हाँथ मिलाता हूँ .
बेटियाँ , बेटों से कम नहीं होतीं  भाई साहब
मैं भरपूर खुश होने की कोशिश करता हूँ
मगर अंतर्ध्वनि माथे पर लकीरें खीच जाती है
कोलम्बस मेरी तरफ फिर देखता है
और मुस्कुराने लगता है
मैं माथे पर खिची  लकीरें मिटाने  लगता हूँ
सदियों से घर कियॆ बैठी
सड़ी गली परम्पराओं से
निजात पाने
कोलम्बस को उठा लेता हूँ और
सीने से लगा लेता हूँ ....
अंतर्ध्वनि अपना रास्ता ढूंढ लेती है
मुझे लगता है
मेरे जीवन की
सुखद परिणति हो गयी है
बेहद सुखद…।

-कुश्वंश  

Wednesday, April 10

कोई दावा नहीं....



कोई
दावा नहीं
याद नहीं 
टूटे सपनों की कोई 
मुराद नहीं 
सोचते थे 
पैरों की  जमीन है बाकी 
बिखरे रिश्तों में
कहीं कोई महक 
है शाकी 
आँधियों में भी जो 
जलता रहा 
सम्बन्ध, दिया 
अंधेरों में भी जो 
भटका नहीं 
जुगनूं सा जिया 
सोचता हूँ
कोई और जहां 
तलाश करू
जा के कहीं और किसी  कन्दिरा  
निवास  करू
जितना भी चाहूं 
नया दौर
यहाँ , वहाँ
जहां से बाहर
नक्षत्रों में भी  नहीं अब
कोई पनाह
तुम मुझे चाह लो,  फिर से
इसकी बची  नहीं
उम्मीद
अब तो किसी से  भी कोई
कैसी भी
फ़रयाद नहीं


Saturday, March 30

एक पेड़ और वो बूढा
















तेज हवा के झोंकों से डर के  
चीख  पड़ता हूँ मैं 
इस अनियंत्रित हवा ने 
पहले पत्तियाँ  छीनीं 
टहनियां मेरे कन्धों से उखाड़कर 
दूर , इधर-उधर बिखेर दीं 
और ये निर्दयी हवा 
फिर भी न रुकी 
जब तक की मैं भूमि से उखड कर 
जमीन पर न आ गया 
अब मुझमें कुछ नहीं बचा 
जिसे  उखाड़  सके ये 
उस बूढ़े की तरह 
जिसका जीवन चित्र मुझसे मिलता है 
मुझे याद है 
जब मुझ मे 
बीज से 
कोपलें उगी थीं 
वो बूढा 
बच्चों के बीच ताली मार कर हंसा था 
जब मैं बूढ़े को छाया देने लायक हुआ 
तब वो जवानी के नशे में था 
उसे ना अपनी परवाह थी 
न मेरी छाया की चाह 
परवाह थी 
बस सौंदर्य की और 
सम्रधता के नित नए सोपानों की 
उसे उसकी भी कोई परवाह नहीं थी 
जो उसे बीच रास्ते छोड़ गयी 
नितांत अकेला 
लेकिन मुझे परवाह थी उसकी 
मैंने उसे ईंधन दिया 
धन दिया 
मेरी गोद में बढे उसके 
बेटी बेटे 
वे कभी मुझपर चढ़े 
मुझे नोंचा, झकझोरा , लहूलुहान किया 
फिर सब बड़े  हो गए
नए नए शहरों में बस गए
जब कभी शहरों से आये
तो हिदायत दे गए
पापा आप दूध नहीं पीते क्या ?
अब बूढा उन्हें नहीं बताता
मुझे बताता है
क्यों नहीं पीता वो दूध
सालों से क्यों नहीं पहने नए कपडे ?
लडकियां आतीं है
और मेरी उभरी जड़ों पर बैठ कर
पंचायत  करतीं हैं
भाई भाभियों के कर्त्तव्य गिनातीं हैं
और चली जातीं हैं
बूढा फिर सुनीं आंखें लिए मेरे पास आता है
और बिना कुछ कहे
डबडबाई आँखों से सब कुछ कह जाता है
अतीत का भोग हुआ यथार्थ
और भविष्य का ग्रहण लगा सूर्य
उसकी आँखों में उतर आता है
मेरी तरह
उसके पास भी
किसी को देने के लिए कुछ नहीं बचा
वो भी होगया है ठूंठ
और हवा को भी चलना है
वो चली
और ऐसी चली की मेरा सीना चीर गयी
कर्ज  से 
बूढ़े की रही सही जमीन भी चली गयी
और मैं 
सीधा तने रहकर भी
पुख्ता और  मजबूती का दंभ भरने वाला
दो फांकों में बटकर जमीन पर बिखर गया
....
सूर्य की  लालिमा फुट रही थी
मेरी बिखरी पडी टहनियों के मध्य
वो बूढा भी  
सो रहा था
बिना हिले डुले 
....










Monday, March 25



                                 कुशवंश 

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