10 अप्रैल 2013

कोई दावा नहीं....



कोई
दावा नहीं
याद नहीं 
टूटे सपनों की कोई 
मुराद नहीं 
सोचते थे 
पैरों की  जमीन है बाकी 
बिखरे रिश्तों में
कहीं कोई महक 
है शाकी 
आँधियों में भी जो 
जलता रहा 
सम्बन्ध, दिया 
अंधेरों में भी जो 
भटका नहीं 
जुगनूं सा जिया 
सोचता हूँ
कोई और जहां 
तलाश करू
जा के कहीं और किसी  कन्दिरा  
निवास  करू
जितना भी चाहूं 
नया दौर
यहाँ , वहाँ
जहां से बाहर
नक्षत्रों में भी  नहीं अब
कोई पनाह
तुम मुझे चाह लो,  फिर से
इसकी बची  नहीं
उम्मीद
अब तो किसी से  भी कोई
कैसी भी
फ़रयाद नहीं


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