30 मार्च 2013

एक पेड़ और वो बूढा
















तेज हवा के झोंकों से डर के  
चीख  पड़ता हूँ मैं 
इस अनियंत्रित हवा ने 
पहले पत्तियाँ  छीनीं 
टहनियां मेरे कन्धों से उखाड़कर 
दूर , इधर-उधर बिखेर दीं 
और ये निर्दयी हवा 
फिर भी न रुकी 
जब तक की मैं भूमि से उखड कर 
जमीन पर न आ गया 
अब मुझमें कुछ नहीं बचा 
जिसे  उखाड़  सके ये 
उस बूढ़े की तरह 
जिसका जीवन चित्र मुझसे मिलता है 
मुझे याद है 
जब मुझ मे 
बीज से 
कोपलें उगी थीं 
वो बूढा 
बच्चों के बीच ताली मार कर हंसा था 
जब मैं बूढ़े को छाया देने लायक हुआ 
तब वो जवानी के नशे में था 
उसे ना अपनी परवाह थी 
न मेरी छाया की चाह 
परवाह थी 
बस सौंदर्य की और 
सम्रधता के नित नए सोपानों की 
उसे उसकी भी कोई परवाह नहीं थी 
जो उसे बीच रास्ते छोड़ गयी 
नितांत अकेला 
लेकिन मुझे परवाह थी उसकी 
मैंने उसे ईंधन दिया 
धन दिया 
मेरी गोद में बढे उसके 
बेटी बेटे 
वे कभी मुझपर चढ़े 
मुझे नोंचा, झकझोरा , लहूलुहान किया 
फिर सब बड़े  हो गए
नए नए शहरों में बस गए
जब कभी शहरों से आये
तो हिदायत दे गए
पापा आप दूध नहीं पीते क्या ?
अब बूढा उन्हें नहीं बताता
मुझे बताता है
क्यों नहीं पीता वो दूध
सालों से क्यों नहीं पहने नए कपडे ?
लडकियां आतीं है
और मेरी उभरी जड़ों पर बैठ कर
पंचायत  करतीं हैं
भाई भाभियों के कर्त्तव्य गिनातीं हैं
और चली जातीं हैं
बूढा फिर सुनीं आंखें लिए मेरे पास आता है
और बिना कुछ कहे
डबडबाई आँखों से सब कुछ कह जाता है
अतीत का भोग हुआ यथार्थ
और भविष्य का ग्रहण लगा सूर्य
उसकी आँखों में उतर आता है
मेरी तरह
उसके पास भी
किसी को देने के लिए कुछ नहीं बचा
वो भी होगया है ठूंठ
और हवा को भी चलना है
वो चली
और ऐसी चली की मेरा सीना चीर गयी
कर्ज  से 
बूढ़े की रही सही जमीन भी चली गयी
और मैं 
सीधा तने रहकर भी
पुख्ता और  मजबूती का दंभ भरने वाला
दो फांकों में बटकर जमीन पर बिखर गया
....
सूर्य की  लालिमा फुट रही थी
मेरी बिखरी पडी टहनियों के मध्य
वो बूढा भी  
सो रहा था
बिना हिले डुले 
....










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