महेश कुशवंश

23 दिसंबर 2014

हमारा उत्थान



कंक्रीट के जंगल मे
जब कभी
आँखें बंद कर मैं
अतीत की गहराइयों मे
बहुत दूर तक चला जाता हू
मुझे दिखने लगते है
आम के वो बगीचे
जिनके आस पास घुटनो तक पानी भरा है
और बहुत ऊंचे दूर पके आम को निहारते
हाथों मे बेंत की छड़ी लिए
आम के  टूट कर गिरने की राह  ताकते बच्चे
पानी मे गर्दन तक डूब कर
पके आम को खोज लेने की खुशी से सराबोर
अलहादित बच्चों का झुंड
दूर तक खिली पीली सरसों
मानो बसंत का आगमन
धरती पर बिखरी प्रकृति की छटा
चने के खेत से फुनगी तोड़कर
नमक मिला चटकारे लेते
सड़क की पुलिया पर बैठे
सैंडो बानियाँन और पटरे के नेकर मे
खिलते - खिलखिलाते बच्चे
सड़क मे दूर दूर तक
सिर्फ साइकिल
कभी कभी कोई जीप
राजनीतिक पार्टी का झण्डा फरफराती
पीछे -पीछे शोर मचाते
नंगे पाव बच्चे
मुझे याद आता है वो गाव
दीवाली मे  छुरछुरिया गोल गोल घुमाते
नए कपड़ों मे लक़दक़
जलेबी और बूंदी के लड्डू से  अघाते
दीयों से तराजू बनाते
टाटा बिड़ला  बनते
होली मे फाग की मस्ती
काका-दादा के पाव  पड़ते ,
दादी को पिचकारी से भिगोते
सारे जहां की खुशियाँ समेटते  नौनिहाल
सर्द रातों मे अलाव के इर्दगिर्द
राजनीति बघारते अराजनैतिक
मेरे इर्दगिर्द  फिर चीखने लगते हैं
कंक्रीट के जंगल
पेट्रोल डेजल के धुए
प्रेशर हार्न की चीख
और इन सबसे काही इतर
इंटरनेट मे उलझे बच्चे
डाइरेक्ट टू होम मे बंधी ग्रहणिया
पब मे मस्त नवयुवक
मैं आंखे खोल कर आसमान निहारने को मजबूर हो जाता हू
शायद उसके पास कोई
उपाय हो ..... शायद

-कुश्वंश

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपने तो गावँ की याद दिला दी...:)

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  2. बहुत ही सुन्दर सार्थक प्रस्तुति

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  3. इस उत्थान में जाने कितनों का पतन छुपा रहता है ...सार्थक चिंतन ..
    नए साल की हार्दिक शुभकामनायें!

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आपके आने का धन्यवाद.आपके बेबाक उदगार कलम को शक्ति प्रदान करेंगे.
-कुश्वंश

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