27 फ़रवरी 2013

बहुत गहराइयां थीं

रात थी
चांदनी थी
तन्हाइयां थीं
मन में कुछ उलझी हुयी
रुशवाइया थीं
रास्ते कुछ हो गए थे
पत्थरों से
जंगलों में
पेड़ पर
हिलते घरों से
सूर्य को डूबे हुए
लम्हा हुआ था
गोधूलि में भी आसमा
तनहा हुआ था
छीलती जो
पीठ को
करती रक्तरंजित
पास में लेटी हुयी
अंगडाइयां थीं
खाइयों में गिर रहा
मेरा शहर
झाँक  कर देखा
बहुत गहराइयां थीं
रात थी
चांदनी थीं 
तन्हाइयां थीं ..

मन में कुछ उलझी हुयी
रुशवाइया थीं

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