22 फ़रवरी 2013

हम कितने भूंखे है


हम कितने भूंखे है
हमारी भूंख को
कौन सा सोपान चाहिए
इस भूंख को
क्या नाम चाहिए
सुख
सत्ता
सम्रधता
या फिर कुछ और
सड़कों पर  मीलों तक  बिखरे पड़े 
मानव शरीर के चीथड़े, 
फुहार बनकर
रक्त के छीटों से सनी दीवारें  
न जाने कितनों के मुह पर
इन बेजुबानों के रक्त के छींटे
बिखरे हैं 
साईकिल  के कल पुर्जों  से  तितर बितर 
और समेटने को 
लटके मुह  लिए 
आंशुओं से परिपूरित कई राजनीतिक पार्टियाँ 
मानवाधिकार की बात करते 
खंडित चेहरे लिए  समाज सेवी 
हमें और कितना रक्त रंजित करेंगे 
कौन सज्ञान लेगा 
कोई रक्त उबलेगा क्या ?
रक्त पर   कितनी  हांडियां और चढ़ेगी 
और कब तक 
यूं ही बिखरेंगी  संवेदनाये 
करुण क्रंदन से बहरे हुए कानों में 
कब तक पड़ा रहेगा पिघला शीसा 
कब तक ..
न जाने कब तक ..

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