15 जनवरी 2013

कौन हूँ मैं




कौन कहता है
हमारा धड़कता नहीं है
दिल
हमारे सपनों में कोई नहीं मुस्कुराता
कभी भी
यादों के झरोखों से कोई नहीं झांकता
कसक नहीं उठती
मिलन की
कसमसाता नहीं है
कोई झरना
ओस सी बूँदें
नहीं भिगोती कहीं भी ,
कभी भी
संबंधों का दर्द चुभता नहीं है बाई ओर
चुभन बनकर 
हिकारत की नज़रों से जब भी
देखता है कोई
मै  भी महसूसता हूँ कोई बेवफाई
मुझे भी भिगो जाती है कोई बरसात
उडाती है मेरे भी गालों पर लटें
कोई  पुरवाई
मैं भी महसूसती हूँ
प्रसव वेदना
मात्रत्व  की बाल सुलभ शर्म
चाहती  हूँ मैं भी
पुकारे कोई तोतली आवाज़
मगर मुझे तो अभी
खुशियों के गीत गाने है
तुम्हारे घर
तुम्हारी गलियों में
तुम्हारे सांस्कृतिक  रीति रिवाजों में
और आंशुओं से परिपूरित करना है
बक्शीश के लिए नंग नांच
यही जो नियति है
अब इसे तुम कुछ भी नाम दो ..
 क्या नाम दोगे .....बताओ .

हिंदी में