2 जनवरी 2013

एक बेटी फिर .....

एक बेटी फिर
दरिंदगी की शिकार हुयी
हम कभी उनको
कभी और उनको कोसते रहे
अक्रॊश रगों में भरते रहे
पोर्च में चहल कदमी करते रहे
दूरदर्शन पर आ रही ख़बरों पर
उबलते रहे
मगर झाँक कर नहीं देखा आसपास
जन्म लेते हुए शैतान को
जिसकी नुकीली आंखें असंस्कृत भाषा में
सांस्कृतिक अश्लीलता परोसती रही
गुनगुनाती रही
हलकट जवानी ... शीला की जवानी ...
और भी न जाने क्या क्या
और उछालते रहे प्रश्न दर प्रश्न
दूसरों से
निशाना साधते रहे कभी इस पर
कभी उस पर
मर गयी हमारी संवेदनाएं
सड़क पर बिखरते रहे संस्कृतिक खून के छींटे
कुछ हम पर भी पड़े
मगर धो लिए हमने मुह फेसवाश  से
उठो जागो आवाहन करो
अपनी संवेदनाएं जगाओ और मत होने दो
किसी  दामिनी का क़त्ल
दर असल क़त्ल किसी दामिनी का नहीं हुआ
हमारा हुआ
हमारी,  आपकी संवेदनाओं का हुआ
सदियों से परत-दर-परत चढी
धुल धूसरित भावनाओं का हुआ
कैसे पैदा हुए दरिन्दे
क्या किसी और लोक से आये
ये जन्मे हमारी अकर्मण्यता से
हमारी अनमनी सी जिम्मेदारी से
नव वर्ष बस तभी मनाएं
प्रण ले और इन रक्तबीज दरिंदों को
जड़ से मिटाए .....
बस ......
अपने आस पास उग  रही कटीली झाड़ियों को
जड़ से मिटायें ...जड़ से मिटायें ...

-नव वर्ष की अश्रुपूरित शुभकामनायों सहित -कुश्वंश

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