26 अक्तूबर 2012

हिसाब बराबर




मेरे घर में
जूठे बर्तन रगड़ कर
फर्श चमकाकर
जब भी वो निरीह  जाने लगती है 
मेरी पत्नी 
उसे आवाज़ देकर बुलाती है 
और परोस देती है 
रूखा सूखा खाना 
रात की बची खुची जूठन 
बड़े चाव से खाती है वो
और धन्यवाद की पनीली आँखों से 
आभार व्यक्त करती है 
पत्नी को संतोष होता है कि
बेकार जाने से बच  गया अन्न 
वो जन्म से भूंखी 
मैली कुचैली धोती से हाथ पोंछती
अहसान के बोझ से दबी 
पूंछती है
कोई काम तो नहीं बचा बीबी  जी 
पत्नी मुस्कुराती है और कहती है
बीन दो गेहू 
और वो जुट जाती है हिसाब बराबर करने 


.. कुश्वंश 

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