12 अक्तूबर 2012

मूल्य निर्धारण की कला


कितनी सच हैं
हमारी अनुभूतियाँ
उतनी ही
जितनी सरे आम करते है हम
और वो जो बाहर आने से रह जाती है
बन जाती है कुंठाएं
जो बाहर आती तो हैं
मगर

अपनी अनगिनित कुंठाओं के साथ
आघात के साथ भी  
कभी स्वयं को
कभी इसको  उसको  
कुछ कुंठाए जो  आत्मसात होती है
जन्म देती है कुछ और परिभाषाएं
जिन्हें परिभाषित करते ही
जन्मने लगते है अपराधबोध
और इन्ही अपराधबोध से
विभक्त होने लगती है हमारी मान्यताएं
मान्यताये
कहाँ से आयी
किसने बनाई
संस्कृति से जन्मी या
पारिवारिक अनुग्रह  से परिलक्षित 
जन्म लेने लगते  है शब्द फिर शब्दकोष 
जिनका कोई मतलब हो न हो 
आकार ले लेते है सदियों के लिए 
और हम
मान्यताएं बदलने का युग परिवर्तन देखने लगते हैं
परिवर्तित कुछ हो न हो
हवाओं का रुख जरूर बदल जाता है
और धुल धूसरित हो जाती है परम्पराएं 
परम्पराएं टूटती हैं तो 
आकार लेती हैं वर्जनाएं
किसने बनाई
कहाँ से आयीं
कई सवाल उठ खड़े होते हैं 
उत्तर भी बहुत से आते है 
मगर कोई भी उत्तर  
अंतर्मन से नहीं आते 
वर्जनाएं न मानने वाले भी 
अंतर्द्वंद  में घिर जाते हैं
और खोजने लगते है
इसके उसके कंधे
वर्जनाएं तोड़ी हैं तो
उन्हें स्वीकारने की हिम्मत भी होनी चाहिए
मात्र विज्ञापन से  वस्तु नहीं बिकती
उसे बाज़ार भी चाहिए 
खरीददार भी चाहिए  
और चाहिए सही मूल्य निर्धारण की कला भी

-कुश्वंश

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