30 जुलाई 2012

प्यार को छाव में



ले तो आये हो हमें
सपनो के गाव में
प्यार को छाव में
बिठाये रखना
सजना
ओ सजना
सपनों में तेरे तैरते तैरते
सूखी नदी हो गयी
सारी कायनात
और मैं
हाथ में भरते भरते
बालू के कण
न जाने कब से
पानी की आस देखती रही
न जाने कितने रेत  के महल
बने भी
उजड़े भी
न रहा आस पास
कोई  गाँव
न रही सजना की
प्यार की छाव
एक दसक रही अभागी
बड़े, छोटे
अंदरी, बाहरी
नातेदार, आने जानेवाले
सभी के बेरहम ताने
घाव से चिपकते रहे रिश्ते  नाते
जीती रही इस आस में
कभी तो सुबह होगी
और सूरज
मुझे भी रोशनी  छूने देगा
बारिश मेहरबान हुयी
भिगो गयी तन मन
मेरे  रक्त के कतरे
अब और नहीं रिसने देंगे
मेरे जख्मों को
छूकर
सहलाकर
सारी पीड़ा आत्मसात्कर
मुझे
ले जायेंगे
सपनों के गाव
बिछायेंगे प्यार की छाव
घटाओं से झांकता सूरज
रोशनी नहीं छिपा सकता
मुझसे अब और दूर नहीं रह सकती
चांदनी
अब इस उम्मीद के सिवा
और कोई रास्ता भी तो नहीं
शायद अब
शिकायत करने का
न घर बचा
न समय .

-कुश्वंश



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