14 जून 2012

कोंपलों के लिए



कुछ शब्द
मन में घुमड़ते
मानसून बनकर
कुछ शब्द पसरे
सड़क पर
जूनून बनकर
शब्दों के मायाजाल में
उलझा रहा हूँ मैं
गुत्थियां दर गुत्थिया
सुलझा रहा हूँ मैं
जागता हूँ
रात भर
करवट बदल
शब्द पहलू सो  रहे
सुकून बनकर
सुबह होगी
मैं जगा सा
उठ पडूंगा 
सुकून के शब्दों को फिर से
मै बुनूँगा
सोचता हूँ शब्दों को
आराम दे दूं
उनमे से  कुछ को
अच्छा सा
कोई नाम दे दूं
भूल जाऊं
शब्दों को
सीना पिरोना
कोंपलों के लिए
जमी पर बीज बोना .




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