4 जून 2012

रिसते जख्म से बातें करें

आओ
रिसते जख्म  से बातें करें
कोई सुने
या  फिर
कुछ भी ना सुने
अंतर्मुखी का
मुख भी चाहे बंद हो
जख्म का आपस में कितना
द्वंद हो
खुली खिडकियों से हवाए लौट जाएँ
बंद दरवाजे महज
सन्नाटा बिछायें
टूटते रिश्तों की चाहे हो महक
टूटते घोसले की हो
चाहे चहक
आओ जलते जिस्म से
बाते करें
अपने ही नाखूनों से कुरेदे  अतीत से
बाते करे
आओ रिसते जख्म से बाते करें
पीठ पर  ठन्डे थपेड़े ही सही
कुछ तो उन
अमराइयों की
बाते करें
क्यों आज फिर
जख्म की बाते करें .

- कुश्वंश

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