19 दिसंबर 2011

जनकवि नहीं रहे ....

मै जानता हूँ
उस जन कवि को 
जिसकी कविताये
बुझे चूल्हों और
घुसे पेटों से निकलती थी
और रोटी को  छीन कर भागते कुत्तों पर
ठहर जाती थीं  
कुत्तों से उस रोटी को
छीन  लेते थे  बन्दर
बांटने का उपक्रम करते  
हक की बात करने वाले बन्दर 
खा जाते थे सारी रोटी
और निर्णय की आस में
मुह ताकता रहता था जुम्मन
उस जन कवि ने 
मुह पर घास ठूसे 
बिवाई फटे पैरों से  
खेत रौदते किसान को  
रोटी के लिए लम्बरदार का  हुक्का भरते 
आज भी देखा है  
सड़के आज भी  दूर हैं 
उस फूस के गाव से  
जहा  आग तो पहुच जाती है  
मगर चूल्हे ठन्डे हो जाते हैं  
तुम कितने भी 
जनकवि बनो  
जलते हुए प्रश्न करो
और तुमने यही तो किया  उम्र भर
और चले गए
तुम्हे हमने तब भी सूना
आज भी
जिनको सुनना था  उन्होंने
न तब सुना ना आज 
क्योंकी शीशे भरे कानो में 
आवाज़ अन्दर तक नहीं जाती 
तुम्हारे असमय जाने से भी नहीं
जीते जी तुम्हे दुतकारता रहा
सरकारी अस्पताल
उस सब के लिए जो कभी
तुम्हारी प्राथमिकताओं में नहीं था
आज तुम्हार्रे गाव की सड़क
तुम्हे याद रखेगी
"अदम गोंडवी" सड़क
लेकिन तुम्हारे  सड़क से आदर्शों पर 
कौन चलना चाहेगा
सारी शक्ति जुटा के भी नहीं
शायद कोई नहीं.

-कुश्वंश

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