22 दिसंबर 2011

अलविदा ए वर्ष.....

अलविदा ए वर्ष
तुम्हारा अभिनन्दन,  
सीने पर ले चले
भ्रष्टता का क्रंदन,  
कभी नहीं सोचा था
तुम ऐसे जाओगे,  
कुछ खुशियाँ को,
कुछ जीवन को,  
रंगबिरंगा कर  जाओगे , 
उथल पुथल से भरा रहा 
ये सारा वर्ष, 
जीवन मुझसे करता था
कितना संघर्ष, 
गर्द  हो गई  मन में थी जो
आस बेचारी, 
सिसक रही  है   कही किनारे 
हवा कुंवारी,
कितनी कुंठित, संकुचित कितनी सीमाएं, 
दर्प लपेटे  खुदगर्जों की सभी दिशाए , 
कहीं किसी कूड़े  में 
कन्या भ्रूण मिले
सभ्य समाज से   
कैसे किसको प्यार मिले  ,   
क्या किया तुमने  कुछ 
अपने से संघर्ष ?
क्या   पल भर भी किया  
स्वयं से  कुछ   विमर्श ?
कहा चले  तुम  
खेल खेलकर, मूल्यों का ,
गहन अँधेरा फैलाकर
निर्मूल्यों का, 
कैसे मैं इस वर्ष को खाली
सा जाने दू,
आने वाले वर्ष से क्या
कामना करू?
जाने वाले वर्ष  तुम्ही 
उसको समझाना, 
आने वाले को बस  सच्ची 
राह दिखाना, 
स्वीकार करो बस बुझे   
नागरिक का वंदन, 
अलविदा ये  वर्ष   
तुम्हारा अभिनन्दन.  

-कुश्वंश


  

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