9 नवंबर 2011

एक प्रश्न आप सब से ...


मै गमले सींच रहा था
दो खाली गमले
मैंने किनारे रख दिए
सोचा कोई अच्छे पौधे लाऊंगा 
तभी एक फेरी वाले ने आवाज़ लगाई
पौधे चाहिए
देसी, अंग्रेजी, हाइब्रिड, मौसमी
या फिर
सदाबहार गुलाब
मैंने दो पौधे पसंद किये
फूल बेचने वाला  बताने लगा
बाबूजी ये जो पहला वाला है ना
जिसमे बहुत से फूल खिले है
बहुत अच्छा  है
छोटी सी जड़
कम पानी,
कम खाद
धूप हो या छाव  
इसे कोई फर्क नहीं पड़ता
सदाबहार फूल देता है
रोज नयी मखमली पत्तियों के साथ
ढेर सारे फूलों से हमेशा प्रसन्न रखेगा
और ये जो है ना हाब्रिड है
बड से तैयार किया हुआ
इसे तो आस पास अपने ही में
कोई शाखाएं उगना पसंद नहीं  
आस पास की शाखाए उगे
तो नोच दीजियेगा
वर्ना एक भी फूल नहीं देगा
समय पे खाद, पानी
न ज्यादा, न कम
धूप से भी बचाना है
हो सके तो ड्राइंग रूम में रखियेगा
साल भर बाद
गमला भी बदलियेगा
मै पौधे के साथ गिनाई गयीं
अनगिनित शर्तों से भौचक था
मै सारी जिन्दगी जी गया
मगर इतनी शर्तों के साथ तो
तो कभी नहीं जिया  
मैंने  पहले वाले ही दो पौधे लिए
जिनको आसान था 
गमले में रोपना
परवरिश करना
जिन्दगी के बंधन क्या कम थे जो
कुछ और बांध लूं
शतों के साथ
कौन जीना चाहता है बंधकर
मगर फिर क्यों ?
एक सीधा सादा  जीवन नहीं जीते हम
और न चाहते हुए भी
क्लिस्ट होते जीवनी  झाझावातों में
चक्रविहू से उलझ जाते है हम
कभी अपनों के लिए
कभी आस पास की ईर्ष्या में
उलझनें और  उलझती हैं
हाइब्रिड जीवन जीने के लिए
उलझनों में उलझना जरूरी है क्या ?
यदि नहीं तो फिर क्यों ?

-कुश्वंश   




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