4 नवंबर 2011

जिन्हें हम देखते ही नहीं...





अचानक नींद खुली
देखा
आसमान में सितारों संग
चाँद
क्षितिज  में  लटका हुआ था
मैं हडबडा गया 
सामने सूरज उगने को है 
और ये चाँद 
घर क्यों नहीं गया  
प्रकृति की ये  अवहेलना क्यों  
ऐसे तो ये  सारे जगत को  
रुसवा कर देगा ..
चाँद से ज्यादा मैं डर रहा था
लालिमा फट रही थी  
तेज चमक और अंगारों से  अभी 
चाँद को  भागना होगा
मैं अधीर हो रहा था   
तारे गुम हो गए थे.. 
जहाज़ डूबते देखकर चूहे.. जैसे 
चाँद अभी भी निर्भीक 
आसमां में निश्छल खड़ा था  
मानो इंतज़ार में हो  
पूरब से सूरज उगा  
मगर अंगार बिखेरता नहीं  
किसी प्रेमी की तरह 
लावण्या बिखेरता हुआ  
रक्ताभ
मात्र चित्रकार की  कलम सा उकेरा
सुबह का कोमल सूरज 
चाँद  भी वही करीब ही था  
प्रेयसी की तरह 
प्रेम के इज़हार को आमदा
सूर्य की किरने अठखेलियों करने लगीं
मानो कह रही हो  
मुझे  तुमसे 
मुहब्बत है......मुहब्बत
और  चाँद शर्माकर छिपने लगा
ओट में
घूंघट में 
और मैं
प्रेम की एक नयी कहानी देख रहा था
और मन
पढ़ रहा था 
प्रेम की अद्भुत परिभाषाएं  
जो बिखरी है  हमारे आसपास 
हम है की  देखते ही नहीं .

-कुश्वंश  


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