3 नवंबर 2011

हम हैं आदम की संतान


गयी दिवाली
घर आँगन में दिए जलाकर
दिल के पिछले कोने के सब 
गम सहलाकर
महल, झोपडी, गली, मोहल्ला
बिखरी खुशियों का हो हल्ला
आले, छज्जे , छत  , चौबारे
रोशन हर घर के चौबारे 
बिखरी धवल चांदनी आँगन 
खुशियों से हर ह्रदय मगन 
ऐसे में  बैठा ये कौन ?
उस कोने में  बिलकुल मौन   
मैंने पूंछा कौन हो भाई 
उसने अपनी व्यथा सुनायी 
मैं भी चाहता मन बहलाना 
तम, हरने को दिए जलाना  
मजहब नहीं इज़ाज़त देता 
काफ़िर समझे, वो अभिनेता 
नहीं समझते कुछ इंसान 
हम आदम की सब संतान 
एक जाति बस  एक धरम 
अलग अलग बस हुए करम
जिसने किया हमें  बेगाना  
उसको बस इतना समझाना 
हम है  सब उसकी संतान  
जिससे धरती हुयी महान 
एक रोशनी उधर दिखाओ  
सच्चे अर्थों में दिए जलाओ
सभी मिलें और लें शपथ 
पकड़ेंगे, मानवता पथ .

-कुश्वंश 

(मोहल्ले के एक घर में रोशनी न देखकर मन उद्देलित हो गया ...बस. ) 

  

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