28 अक्तूबर 2011

दीपावली की शुभकामनाएं

इस छोर   से उस छोर तक 
उस पूरी लाइन में
जगमग करते
गली चौबारे
रोशनी और पटाखों से
खिलखिलाते बचपन
दीपावली की शुभकामनाएं 
एक दुसरे को बांटते शब्द 
उस घर से दूर थे क्या ?
रौशनी का एक दिया भी नहीं 
अचानक 
एक हाँथ में दिया लेकर 
दादा 
दोमंजिले पोर्च में आते है 
औए एक दिया लेकर
दादी  नीचे  नज़र आती है  
में पत्नी संग 
उन्हें शुभकामनाये देने जाता हूँ 
वो दरवाज़ा नहीं खोलते 
में  दरवाजा दो तीन बार खटखटाकर लौट आता हूँ 
और शुभकामनाओं के आदान प्रदान के साथ
सो जाता हूँ 
सुबह सुबह 
दादा दादी को  दरवाजे पर देख कर
चौंक जाता हूँ 
इससे पहले में   कुछ बोलूँ
वो कल के लिए माफी मांगते है 
बेटा बड़ी भारी हो जाती है  दीवाली
जब लोग पूछते है 
कोई बेटा नहीं आया
त्यौहार में भी 
हम बेटों की मजबूरी समझते है 
लोग नहीं समझते
और हम किस किस को  बेटों की मजबूरियां गिनाये 
लोग  शुभकामनाओं से पहले 
सवाल करते है 
जिसका कोई जवाब नहीं होता 
भरी आँखों से वे हमें
आशीर्वाद देकर चले गए 
हम दीवाली के इस आदान प्रदान  पर 
बुझे हुए दिए हो गए थे 
जलते हुए भी  .

-कुश्वंश
 

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