8 सितंबर 2011

कहानी तोता मैना

मैं बहुत दूर कहीं 
अक्स छोड़ आया हूँ
लौट कर महज़ बस 
खाली हाँथ आया हूँ
यादों में जो भी थे , 
जैसे भी थे
घायल पंछी
उड़ न पायें दूर कहीं , 
उनके पर क़तर आया हूँ 

कहने को नहीं  
कुछ शब्द  
जेहन में बाकी
रहा न कुछ  
तुम्हें  प्रेम का
नशा शाकी
हाँथ  खाली  है
मगर
शिखर तक अनुभूतियाँ हैं
हृदय में छिपी बैठी जो  
खालिश, 
निरी 
नजदीकियां है

चाह लूं जितना भी  , 
हो जाऊं  दूर 
रुखसत कर लूं
दूरियां कितनी भी 
दामन भर लूं
भूलती नहीं जो 
आज भी
कशिश है 
मन  में  
पिघल जायगी अब भी 
सारी बर्फ 
जमी तन में

देख लो फिर 
उन्हीं  आँखों के सपनों से  मुझे 
कुछ मुझ पे 
इनायत कर लो 
चाह लो फिर उन्ही रेशमी  
बातों से मुझे

चलो छोड़ते है 
एक बार फिर से
ओढी हुयी गंभीरता 
छेड़ते हैं  फिर  से 
उसी  जगह 
बाग़ में  
हम  और तुम 
किस्साये तोता मैना .


-कुश्वंश 





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