12 सितंबर 2011

माँ और.... माँ की भाषा









ये कैसी बोली बोलते हो
तुम्हे हिंदी नहीं आती क्या ?
तुम्हारा ये अंग्रेजीपन 
हमें सोचने पर मजबूर कर देता है 
तुम किस देश के हो
भारतवर्ष की रास्ट्र भाषा तो हिन्दी है
क्या तुम भारतीय नहीं हो
और अगर हो तो
तो तुम्हे संस्कृति का भान नहीं है
मात्र भाषा क्या होती है
शायद  इस तथ्य से  अन्विज्ञ हो
तुम्हारे आसपास जब 
कोई तुम्हारी भाषा में जवाब  नहीं देता
तुम्हे नहीं लगता
किस देश के हो तुम
कहाँ छूट गयी तुम्हारी धरती
तुम्हारे लोग
और मुलम्मा चढी अंग्रेजियत के साथ
रह गए तुम
निपट अकेले
शायद नहीं  भूले होगे तुम 
माँ की गोद 
लहलहाते खेतो में अठखेलिया करते 
सरसों के पीले फूल 
नंग -धडंग,  वो कितने सारे  दोस्त 
पेड़ों पे चढ़कर तालाब में कूदते 
उन्ही में कोई एक 
तुम भी तो थे 
फिर कब भूल गए तुम
अपनी माटी की सुगंध 
गेहूं की बाली 
गन्ने के खेत 
गाव की कच्ची  सड़क और पुलिया 
डूबता सूरज 
बैलों के गले में पडी घंटियों की आवाज़ 
ढपली , मजीरे  और 
आल्हा गाते बब्बू भैया 
जो शायद तुम्हारी  भाषा में नहीं थे
खालिश देसी  भाषा में थे
तुम्हारी  मात्रभाषा में थे
....
मेरे प्यारे मित्र 
जैसे माँ सिर्फ माँ ही होती है 
वैसी ही होती है माँ की भाषा 
और माँ किस सम्मान की हक़दार है
तुम जानते हो शायद ?
कोई बेटा   
इतना भी  नालायक नहीं होता .


-कुश्वंश 





हिंदी में