10 अप्रैल 2011

बेहद सच्ची दुनिया

कई शब्द मिलकर  
लेते है एक आकर
उस आकार से झांकती है पंक्तिया 
पंक्तियों में   
संवेदनाये
संवेदनाये फिर आकार लेती है  
बहते है आंसू 
वो आंसू  
जम जाते है जब  
गालों पर  
बन जाते है मोती 
उस मोती को अपने पोरों पर  
उठाकर 
जब भी देखता हूँ मै
मुझे दिखता है ब्रम्हांड 
दूर तक फैले चाँद तारे
तारों के बीच   आकाश गंगा
उस गंगा से दूर एक सूर्य
सूर्य की आगोश में पृथ्वी-आकाश 
पृथ्वी  से झांकता
बचपन
बचपन में
खोजने लगता हूँ मैं
अपना अक्श
खुश होने की ये यात्रा
अच्छी है ना
निर्विकार, बेफिक्र संवादों से गुथी वो दुनिया
सच्ची है न
बेहद सच्ची  ..

-कुश्वंश

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