9 अप्रैल 2014

रिस्ते..... बेमतलब..... ?



तुम किसी काम के नहीं हो
न तुममे वो बात रही
जो कभी हुआ करती थी
न तुम मेरे प्रति संवेदनशील हो
न ही केयरिंग
दिन भर
एक नौकरानी की तरह खटती हू
इतने बड़े घर मे
तुम्हें मालूम है
कहाँ कहाँ जाले लगे हैं
और कितने कपड़े होते है
धोने के लिए
मशीन है तो क्या अपने आप धो लेती है
कितने दिन से नही गए कभी बाहर
तुम्हें याद है क्या ?
और
जाते भी हो तो
ज़िंदगी का खटराग लेकर
आटा दाल चावल और मसाले खरीदने
अपनी ज़िंदगी कितनी बेरंग है
कभी सोचा है
आज तक तुमने कभी नहीं पूंछा
मुझे क्या चाहिए
मुझे भी पहनने होते है कपड़े
जो कभी पुराने भी होते है
और समय के अनुसार भी नही होते
तुम कहते तो नही मगर
मुझे महसूस हो जाता है
मेरे बीमार पड़ने पर
सहानुभूति की जगह
मुह सिकोड़ लेते हो
क्या लोक व्योहार निभाना है
तुम क्यों नही लेते ज़िम्मेदारी
और जब मैं निभीती हूँ तो
तो रोते हो पैसों का रोना
अपने ऊपर क्या खर्च करती हूँ मैं
इन तीस सालों का हिसाब लगाकर देखो
ज़िंदगी दो वर्ष की लगेगी....... बस
ये पहाड़ जैसे ज़िंदगी
जिसमे बस..... ज़िम्मेदारी .....ज़िम्मेदारी और ज़िम्मेदारी
मुझसे नही होता अब
........
मै...... सफाई की मुद्रा मे हूँ
तीन .......अंकों से  शुरू हुयी ज़िंदगी
यहीं पहुचनी थी
कमरे की वाल क्लॉक
खरीदने मे तीन साल लगे थे
ढाई सौ मे था
किराए का मकान
तुम्हारे पापा का........ प्रतिदिन मददगार हाथ
ज़िंदगी की गाड़ी को खींच रहा था
शायद मै तब भी  ऐसा ही था
किसी काम का नहीं
जीवन चल रहा था बस....... चल ही रहा था
महाभारत हुयी थी आज से सदियों पहले
रामायन मे केकयी रूठ गई थी
और क्या हश्र हुआ था अयोध्या का
मैं काँप जाता हूँ
तुम अक्षरशा ठीक हो
मगर तुम्हारे शब्दभेदी वांण
मुझे भी घायल करते हैं
और मैं कुछ न कर पाने की मुद्रा मे
बस प्रातक्रिया व्यक्त कर सकता हू
अप्रचलित शब्द बोलकर
ये जानकार की तुम आहात होगी पहले की तरह
और मैं किंकरतवयविमूढ़
देखता रहूँगा तुम्हारा रौद्र रूप
रेल की पटरियों की तरह दौड़ती ज़िंदगी
बोगियों की तरह
पटरियों को एक करते बच्चे
हमे एक छत के नीचे
एक डायनिंग टेबिल पर
एक बिस्तर पर
जीने  को  प्रेरित करते हैं
जीवन की कठिन राह पर
धूल धूसरित हो गए माध्यम वर्गीय रिस्ते
सरपट दौड़ रहे है
यू ही
बेमतलब

.....







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