25 अप्रैल 2014

कोई नया आसमाँ



रात के अंधेरे मे
जब भी
सन्नाटा चीखता है
मै अपने कान पर हथेली रख लेता हूँ
शायद
अवांछित शब्द
पिघले शीशे से ना हो जाएँ
........................
शब्द !
जो कभी रेशमी अहशास से होते थे
दिल मे सरकते थे,
कभी बंद आँखों  मे
चाँदनी सी अठखेलियाँ करते थे
और कभी
ओस की निर्मल बूंदों से
मेरे चेहरे पर बिखर जाते थे
मैं रोमांचित हो
शब्दों के व्यापक अर्थ तलासने लगता था
मगर शब्द
कोई अर्थ नहीं देते
बस देते थे कोई अहसास ....कोमल,
और
समझ से परे किसी क्षीतिज मे
आकाश गंगा बना देते थे
और हम उस आकाश गंगा मे
ढूंढ लेते
कोई आसमाँ
कोई नया आसमाँ
नई प्रथ्वी सा..........

कुशवंश

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