15 जनवरी 2014

सब आतंकवादी हो गए




कल  शहर  मे
कुछ भेड़िये नज़र आए
रक्त रंजीत चेहरे
अंगारे उगलती आँखें
तेज रफ्तार गाड़ियों मे
शहर के इस कोने से उस कोने तक
डुबोते रहे आशुओं मे
इसको उसको टक्कर मारते
लहू लुहान करते
फिर न जाने कहाँ छिप कर बैठ गए
मेरा शहर ससंकित था
भेड़ियों के छिप जाने से आशंकित था
समय  बीता
भेड़िये घुल मिल गए
दूध मे पानी की तरह
हमारे घरों तक कर ली पहुँच
हम ले गए उन्हें
अपने गलियारों मे , अंदर के कमरे तक
वक्त बीता
शहर के एक कोने से सुनाई पड़ी चीखें
एक पड़ोसी ने
पड़ोसी के घर घुस कर
उसकी मासूम को कुचल दिया
कैमरे चमके
ब्रेकिंग न्यूज़
दिन भर उस पड़ोसी की उड़ती रही धज्जियां
समय बीता , सब भूल गए
मगर भेड़िये , लाल आँखों से रहे छिपे
किसी और फिराक मे
फिर वे जागे
और मानवता को कर दिया शर्मसार
भाइयों को काट दिया
भाई ने
पिता को  चूर किया
बेटे ने
माँ को बेटी ने नहीं दी रोटी
हम तलासते रहे
शहर मे आतंकवादी
मगर वो ऐसे रक्त मे मिले कि
हम और आप
सब आतंकवादी हो गए
आतंकवादी हो गए।

-कुशवंश
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ टंकण गलतियाँ हैं सुधार लीजियेगा जैसे लहू तहू हो गया है और भी हैं !

    रचना बहुत ही सुंदर है !

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  2. घर घर मे , शहर शहर मे आतंकवादी पैदा हो गए हैं ! बिल्कुल हम आप जैसी शक्ल मे ! सुधरना होगा !

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  3. हम और आप
    सब आतंकवादी हो गए
    आतंकवादी हो गए।
    .............वक्त के साथ सब आतंकवादी हो गए !!

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आपके आने का धन्यवाद.आपके बेबाक उदगार कलम को शक्ति प्रदान करेंगे.
-कुश्वंश

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