16 जुलाई 2013

बहुत दूर तक निभाएंगे



हर शाम की 
जरूरी  नहीं  कि , रात हो
हर निःशब्द के बाद 
जरूरी नहीं  कि , बात हो 
स्वप्न  कितने भी 
डरावने हों , 
बीत जायेंगे 
फासले  कितने भी हों पुराने 
रीत जायेंगे 
कसक हैं , तो बस
धैर्य बनाए रखिये
संबधों की महक 
बंद आँखों में  
बसाए रखिये
लम्हे-लम्हे , 
खामोश अदाओं की तरह 
बीत जायेंगे 
बस यही जज़्बात
जिन्दगी का साथ 
बहुत  दूर तक निभाएंगे .



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