21 दिसंबर 2012

खुश नसीब


वो जो दिल के करीब है
वो कहाँ ?
खुश नसीब  है
दूर रहकर भी जो
जुबा पर रहे
हम तो लिपटे रहे
उघडे हुए
वस्त्रों की तरह
प्रयुक्त हुए जंग में
जंग के
अस्त्रों की  तरह
चले थे बहुत दूर
साथ निभाने....
भरोसा लेकर
हुए  ओझल 
अधूरा सा सहारा देकर
तुम्हे खोजू कहाँ मैं
ढूंढकर लाऊँ कैसे
इस शूल से जंगल में
कोई फूल को पाऊँ  कैसे
शब्दों का मकड  जाल है
और जाल में
फसा है कोई
रक्त् सने  दिल में
बसा दर्द
भुलाऊँ कैसे
उलझा हुआ हूँ जाल में
और रास्ता नहीं है कोई
सोचता हूँ
बुने जाल में
जाल छुडाऊँ कैसे


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