7 सितंबर 2012

किसे बदलना चाहिए .











पहले तुम 
हमारे मन मंदिर में 
दूर तक समाये थे 
तुम्हें  मेरा मन बार बार 
नमन करता था 
श्रध्दा से मस्तक बार बार 
नत हो जाता था 
तुम्हारे सानिध्य में 
अपार खुशियों का 
अमिट  अनुभव करता था मैं 
तुम्हारी भक्ती को 
प्रसारित  कर
तुम्हारे गुन्गानों का 
रस बहाता  था मैं 
आज 
न जाने क्यों 
तुम्हें देखने का भी 
मन नहीं करता 
तुमसे मुह मोड़ 
तुम्हारी अवहेलना को 
उद्देलित होता हूँ मैं 
कारण तुम स्वयं हो 
तुमने ही 
मेरे मन मंदिर के 
कई घरौंदे तोड़े है 
अपने लिये 
नफरतों के 
कई बिम्ब उकेरे है 
तुम्हारे इस विस्वासघात ने 
बना दिया है मुझे  बबूल
सूच्याकार काँटों से आक्छादित 
जिसके पास अब कोई नहीं आता 
और आता भी है तो 
रक्तरंजित हो  
निरा रक्त से सना बिलखने लगता है 
मैं  और भी हंसनें लगता हूँ 
मुझे नज़र आने लगता है  
तुम्हारा प्रतिबिम्ब 
अब ये  तुम्हे सोचना है 
किसे  बदलना चाहिए .

-कुश्वंश 

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