2 सितंबर 2012

शहर से पलायन कर आया सुकून


कल गाव की 
पगडंडियों से जुडी 
सूनसान सड़क  पर 
इधर उधर झुके पेड़ों से आक्छादित 
मिल गया मुझे 
शहर से पलायन कर आया सुकून 
वो बड़े मजे से 
एक पेड़ की छाव तले बैठा 
चैन की बंसी बजा रहा था 
मुझे तो नहीं लग रहा था 
अभावों से त्रर्सित है वो 
मैंने आगे बढी कार को पीछे किया 
और उसके सामने ला खड़ा किया
वो न विचलित हुआ न आंदोलित 
मानों  उसे अंदेशा था 
मैं आऊँगा  
वो मुझे देख मुस्कराया 
मुझे मालूम था तुम आओगे 
और तुम ही क्यों 
हर वो शख्स जिसे गाव की मिट्टी से 
कोई लेना देना है 
शहर से पलायन करेगा 
.......
रेल पटरियों के इर्द गिर्द 
सडांध जीते तीनों पीढ़ियों के लोग 
रात के सन्नाटे में 
चौराहों और रैन बसेरों पर
रात्रि क्रिया में मग्न 
सूरज निकलते ही भागम-भाग 
पान मसाला ,भुट्टे ,नीबू और लकड़ी का कोयला 
खीरे, ककडी और केलों से 
ठेले सजाते लोग 
सांझ होते हे 
देशी ठेकों पर 
इसकी उसकी सबकी माँ बहनों की 
इज्ज़त उतारते और खिलखिलाते लोग 
स्कूटरों 
मोटर साइकिलों  और छोटी बड़ी कारों से 
सम्रधता का स्वांग भरते लोग 
मालूम है सुकून तो तरस जायेंगे 
और भाग कर फिर यही आयेंगे 
.....
बेहतरीन माल 
कंक्रीट के जंगल 
और रेव सिनेमा भी 
बहुत दूर तक सुकून नहीं दे पाएंगे 
बर्गर,पीजा और महा ठंडी बिअर 
कब तक अपने रोग छिपाएंगे 
अपनों के सुख से विचलित 
अपने  दुखों का ठीकरा   दूसरों पर फोड़ते 
कब तक  भ्रम में जियेंगे 
पलायन कर यही आयेंगे 
मैं जो वहाँ से भाग आया हूँ 

देखो  
इस पेड़ की गिरती पत्तियों को देखकर 
यहाँ कोई नहीं हंसता 
इस पर उगे हुए फल 
पहले आओ पहले पाओ की तर्ज़ में है
इन पर कोई दाव  नहीं लगाता  

सुकून ने मेरा हाथ पकड़ लिया 
आओ बैठो 
आये हो तो कुछ महसूस करो 

मैं  हाथ छुडाकर भागा 
मुझे वापस जाना है 
वहा घर पर मेरे इंतज़ार में हैं 
डोमिनोस से मगाए गए पीजा के साथ 
बिग बाज़ार से आये मोमोस , कोल्ड्रिंक 
और आँखों में चमक 
वीकेंड के इंतज़ार में मेरे बच्चे ..

-कुश्वंश 

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