31 अगस्त 2012

हमारी अभिव्यक्तियाँ












मन का मंथन 
कानों को छूती
झकझोरती 
पुरवा हवा 
आभासी स्याही ,कलम और 
स्क्रीनी पन्नें पर उभरे 
कुछ शब्द 
स्वप्नीली आँखों से ढलके
सुर्ख अश्रुबिंदु 
अनहोनी सिहरन से 
उत्थित रोये 
या फिर 
दोनों होंठ मिलकर बनायें जो 
मोनालिसाई मुस्कान 
किसी सुखद  होनी के इंतज़ार में 
बंद आँखों की बोझिल पलकें 
किसी कदम्ब के इर्द गिर्द 
अठखेलिया करते 
पेम-रस भूंखे  प्रश्न 
और उन प्रश्नों में 
कुछ और प्रश्न भरते 
निरुत्तरित उद्धव 
गोपियों में न जाने कौन सी 
आस जागते 
द्वारिका गए कृष्ण 
बताओ 
इसके सिवा और कौन से तरीकों से 
व्यक्त होती है 
हमारी अभिव्यक्तियाँ  

-कुश्वंश 

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