29 अगस्त 2012

दलित चेतना



कितनी  जाग्रत हुयी
दलित चेतना 
धूल धूसरित  इंसान को 
देने मुख्य धारा 
कौन सी गंगा निर्मल हुयी 
बुधवा की बेटी से 
कब निकली  गोबर की महक 
गाव के लंबरदारी छिछोरों  ने 
कब उसके तार तार कुरते में नहीं झांका 
धनिया 
मैला ढोने नहीं आयी क्या  ?
नत्थू  की अम्मा 
ठकुराइन को 
तेल लगाने नहीं आयी क्या ?
चक्कू नाई 
बोदी पहलवान की मालिश नहीं कर गया क्या ?
बटाई का बराबर हिस्सा  मिला ननकू को  ?
रधिया काम से 
बिना नुचे लौट आयी क्या ?
फुलवा का प्रसव 
ब्लेड  से नहीं जना क्या ?
खुदाबक्स  ने 
ठाकुर साहब की चौपार की घास नहीं छीली क्या  ?
नन्हें ने मरे बैल की 
खाल नहीं उतारी क्या ?
काकू का टिकट कलक्टर बेटा 
कब से   गाँव  नहीं आया 
दनिया के बेटे को बाप का नाम देने 
..........
चेतना 
चाहे दलित की हो  या 
हाशिये पर पड़े लोगों की 
मात्र 
मस्तिस्क झकझोरने की कला नहीं 
युग परिवर्तन की सोच है 
दूर तक घर कर गयी 
सड़ी गली प्रथा बदलने की सोच है 
और जब 
सब कुछ बदल  जाए तो 
ये दलित शब्द भी बदलना चाहिए 
इसमें छिपी बू भी
हां बू भी ..
निकलनी चाहिए .

-कुश्वंश 



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