12 अगस्त 2012

अद्रश्य भय से..





मै ,
सोते हुए भी
आँखें नहीं मूंदना चाहता
डरता हूँ
कही न खुलीं तो
एक भय कहीं दूर तक
मेरे अंतर्मन मे
घर किये बैठा  है
नस्वर शरीर को
नस्वरता प्रदान करने के लिए
कोई
छिपकर बैठा है
आत्मा से अलग
मेरे ही शरीर मे
जो मुझे अचानक पता लगेगा
और मुझे विवश करेगा
आँखे मूंदने को
स्वयं से भी
परिवेश से भी
साधारणतया आँख मूंदने मे
मुझे कोई भय नहीं
मगर अभी
मुझे
बहुत से काम करने हैं
देख रहे हो ना
दो स्कूल जाते हुए
दो स्कूल से निकलते हुए
पत्नी की दमित इच्छाएं
पूरी करनी हैं बहुत सी अभिलाषाएं
माँ-पिता की सूखी हड्डियों की पुकार
बहन को
किसी घर की  दरकार
बहुत कुछ शेष है
हो सकता है किसी नज़रों मे
कुछ भी विशेष न हो ,
मगर
मेरी बंद पलकें
वीभत्सता  को
खूब पहचानती है
इसीलिये
मैं
मुंदी आँखें
अभी
अफोर्ड नहीं कर सकता
इसी लिए आँखे खोलकर ही सोता हूँ
किसी
अद्रश्य भय  से...

कुश्वंश

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