14 जुलाई 2012

अनगिनित प्रश्न



चलो
में  अपनी
हथेली काट लेता हूँ
निकलते  रक्त से
हल कर लेता हूँ
सारे सवाल
दहक  रहे   जो
हमारे ह़ी
अप्रायोगिक मस्तिस्क में
अनगिनित प्रश्न
जो मान लेते है मुझे घोर असफल
और बार-बार
धकेलते है मुझे
कभी रस्सी और पंखे की ओर
और कभी
भारीभरकम रेल की पटरियों की ओर
में देख  रहा  हूँ
खून से लथपथ
बूढ़ी आँखों की रोशनी
पत्नी और मासूम बचपन  के
रक्तरंजित आँसू
अपनी लम्बी खिची जबान से
अबोले प्रश्न 
क्षतविक्षत शरीर के टुकड़े
बोरों में भरते
या फिर
डंडे से समेटते सुरक्षा के रखवाले
और उन्ही किन्ही टुकड़ों में
फैले है मेरे भी प्रश्न
हल की तलाश में
जिसके लिए मैंने ये सब किया था
मेरा जीवन का खोना भी
किसी प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ
उन्ही अनुत्तरित प्रश्नों को लेकर
में  निकल पड़ा हूँ
फिर गंतव्य की ओर
इस आशा के साथ कि शाम को
लौटूंगा
नयी आशा और उमंगों के साथ .

-कुश्वंश



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