24 जनवरी 2012

मन की हदें


मन कभी कभी
हदे पार कर जाता है 
उन हदों को भी
जो कभी पार करने के लिए थी ही नहीं
मगर न मै उसे रोक सकता हूँ
न प्रयास ही करता हूँ
क्योकि मै भी
मन को हदे पार करते देखने का
सुख लेना चाहता हूँ
नैतिकता के इशारे
धरे रह जाते है
और कलयुगी रावन
अपहरण कर लेता है एक और सीता
रोज उसे घरों में आते जाते देखकर
उसी पान की गुमटी के पास
घात लगाकर
और तथाकथित राम
कलयुगी सीता को
ढूँढने का प्रयास नहीं करता
क्योकि वो रावन को जानता था
रावण को ही नहीं
वो तो उसकी माँ कोभी जानता था
जो उसके गाव की थी
जिसे वो चाची कहता था
जानता तो वो सूपनखा को भी था
जिसे उसका भाई
उठा लाया था गाव से
और ये अपहरण बदला भर था
मै ने पहले ही कहा था की
मन जब सारी हदे पार कर देता है
तो महाभारत होते देर नहीं लगती
और हमारी पौराणिक संस्कृति
तार तार हो जाती  है
द्रोमदी  के चीर हरण की तरह 
भरी सभा में  
ऐसे ही जैसे
सभ्रांत  घरों में झाडू -बर्तन करने वाली रेनू
जब कुंवारी माँ बनी 
सब कुछ ठीक रहा
मगर जब उसने जानना चाहा  उस बच्चे  का पिता
तो उसे समझ ही नहीं आया   
क्योंकी
हदे पार करने वाले मन
एक दो नहीं पांच थे
पांच मुख वाला एक रावण नहीं
एक मुख वाले पांच रावन
मगर रेनू समझ ही नहीं पायी
असली कौन है रावन
मगर अब वो जानना चाहती है  
एक रावण का नाम 
आखिर उसका भी कोई हक़ है
क्या अदालत ?
मन की हदे परिभाषित कर पायेगी
और रेनू को न्याय दिला पायेगी
और सभ्य समाज के रावन
दशहरे से पहले
ढूंढ  लिए जायेंगे ...
आप बताये रेनू का क्या होगा
क्या मिल पायेगे उसका हक़ ....? 

-कुश्वंश



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