21 जनवरी 2012

रेत के महल


नींद कभी आती है क्या
नीद तो कही आसपास ही छुपी होती है
और गाहे बगाहे
आगोश में ले लेती  है
बिना तुमसे पूंछे
तुम्हे सोना है क्या....?
कोई और पूंछता है
सो गए हो क्या ?
और तुम खोल देते हो आँख  
नहीं
मै सो नहीं रहा था
हालाँकि तुम्हारा मुस्कुराना
मझे अहसास करा जाता है
मैंने पकड़ा हुआ झूठ बोला था
ऐसे ही छोटे छोटे झूठ
न जाने कितने बोलते है हम दिन प्रतिदिन 
जिन्हें न भी बोलते तो
दुनिया यूं ही चलती रहती
निर्बाध  
सम्बन्ध कितने भी पुख्ता क्यों न हों
झूठ पर कभी नहीं टिकते
कभी न कभी दरकते ही हैं
और जब दरकते है तो
वो छोटा सा झूठ भी
मुझ पर हँसने से नहीं चूकता
जिसका मेरी नजरों में कोई वजूद ही नहीं था
असमय की  
ये नींद भी गैर जरूरी होती है
द्रोपदी को यदि नहीं आती तो
अभिमन्यू चक्रविहू से बाहर आ जाता
और शायद तब  
महाभारत का कथ्य ही बदल जाता
धर्मराज युधिस्ठिर ने
गर न बोला होता अस्वस्थामा का झूठ  तो
द्रोणाचार्य के कहर से
पांडवों को कौन बचा पाता
शायद चक्रधारी  कृष्ण  भी नहीं
और शायद तब
छोटे छोटे झूठों से पडी नीव पर
बड़े झूठों की अट्टालिकाएं न खड़ी होती
हम भी ईमानदार होते और
हमारी संतति भी  
रेत के  महल नहीं बनाती.....

-कुश्वंश

   


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