18 जनवरी 2012

मेरा शहर



कल रात उसने
फेंक दी
रोटियां
सड़क पर,
भूंख से मरता रहा
दिन भर
मेरा शहर,
आवाज़ है,
न चीख है,
न ही जद्दोजहद,
लाशों पे खेलने की
अब तो हो गयी है हद,
आँखें हैं ,
होंठ हैं , और
तराशा हुआ बदन,
घर में ही
दीवारों से
बरसने लगा है धन,
ले दे के कुल बचा था
मेरे घर का आइना,
मैंने ही  घर में फेंके थे
पत्थर यहाँ-वहां,
रात है,
चांदनी है,
रोशनी है,
जमीन पर,  
लगता है कोई और  
किसी और घर में है,
मंच है,
भीड है,कसमें है,
अंगारे है,
कठपुतलियों के नाच में 
मशगूल है शहर.  


-कुश्वंश

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