7 जनवरी 2012

मै समय हूँ


मै समय हूँ
तुम्हारे आस-पास रहता हूँ
तुम्हारे साथ चलता हूँ  
तुम्ही
कभी पीछे रह जाते हो 
और 
अपराधबोध से ग्रसित हो जाते हो  
कभी आगे निकल जाते हो  अतिरेक में
तब मुझे तलासते हो  
शून्य में
इस सब में 
मै जिम्मेदार कहाँ हूँ  
कैसे दोषी हूँ मै  
तुम कहते  हो  
मैं बीतता हूँ  
दर-असल मै नहीं तुम बीत रहे हो  
वर्ष प्रतिवर्ष 
कम हो रही तुम्हारी उम्र 
मै तो अछुन्य हूँ 
तुम्हारी आत्मा की तरह 
जिसके तुम्हें छोड़ने पर भी 
मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा 
तुम हो की मुझे कभी  
अच्छा कहते हो कभी खराब 
अपनी भौतिकता के तराजू में तौलते हो मुझे 
अपने कार्यों का प्रतिफल
समय पर थोप देते हो 
और बचने की नाकाम कोशिश करते हो 
तुम्हे याद है
जब तुमने मुझे नहीं खोजा था
किसी के लिए
समय की 
कोई  सीमा थी ही नहीं 
तब  
इंसानी रिश्ते,
अनगिनित कोमल भावनाएं 
सामूहिक सोच की परम्परा 
समाज  के दुखों को  आत्मसात करने की कला
असभ्य युग में भी   
रस्सी की तरह कसी, गुथी थी  
पेड़ पौधे
नदी तालाब और 
पत्थरों में भी 
रिश्ते ढूँढने की कला 
खोज ली थी तुमने  
मुझे खोजा  एक माध्यम सा 
और अपना सारा दोष
मुझ पर मढ़ दिया 
सिर्फ मुझ पर 
मगर मै अब भी 
तुम्हारे पास ही खड़ा हूँ 
तुम्हारे सारे दोष 
अपने ऊपर लेने  
इसलिए कि कभी तो समझ सको तुम मुझे
मै मात्र समय हूँ 
बस.....

-कुश्वंश

 

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