4 जनवरी 2012

भय




सदियों से
जीता आ रहा हूँ मै
एक भय में
एक डर 
जो कभी मेरा साथ नहीं छोड़ता
जो मै हूँ
क्या वही हूँ मै ?
या जो मै नहीं हूँ
उसी को लोग मुझे क्यों समझते है ?
तुमसे सम्पूर्णता की अपेक्षा
जब मेरा भय बढाती है 
तब मुझे 
तुम्हारे सहयोग की कोई
उम्मीद नहीं होती
मंदिर में  नाक रगड़ता मै 
सारा भय  वहा उड़ेल  देता  हूँ 
जहा भूंख से  भीख मांगते बच्चे
मुझे अपने भय से 
छोटे लगते है 
और मै उन्हें
प्रसाद दिए बिना आगे बढ़ लेता हूँ 
और सोचता हूँ
मैंने गलत किया
और एक भय  फिर सर उठाने लगता है
अपने  भय समेटे
सोते हुए भी
सपनो में भी
डरा  महसूस करता हूँ
सोचता हूँ 
इस डर से बचने के उपाय 
कोई ताबीज़ पहन लू क्या ?
या कोई हवन  करूं
मंदिर तो मै हो आया हूँ
सच्चे मन से नहीं गया क्या  ?
रात भर जागते रहो की आवाज़
मुझे बुत बन जाने से रोक लेती है
रास्ते  भर जाते है
भूकंप और पत्थर हो जाने का भय
मेरे दरवाज़े पर
हल्दी का तिलक लगा देता है
प्रार्थनाये होने लगती है
मस्जिदों से अज़ान भी
मगर भय  नहीं जाता
न कही धरती हिली
न कोई बना बुत और पत्थर
बस भय कही दूर तक
चिपक कर बैठ जाता है
क्यों ?
दरवाजे पर शनी बाबा  दस्तक देते है 
मै उनके तेल में  कुछ पैसे दाल देता हूँ 
मेरा भय  कम होगा क्या ?
ये मेरा देश है
ये भय भी मेरा है
न मैं देश से अलग हूँ
न मेरा देश भय से
काश ! कम ही हो जाय कुछ
शायद  ......

-कुश्वंश

हिंदी में