29 दिसंबर 2011

मै तुम्हारी आत्मा



मै क्यों ? 
तुम्हारे शरीर में रहूँ,
एक हारे हुए शरीर में,
जिसने कभी अन्दर की ओर
झांक  कर देखा ही नहीं,
और बढ़ता रहा
स्वयं सोच के रचे  घरौदे की ओर ,
सम्रधता की ओर,
न कोइ रहे तुम्हारे  अपने
न पराये ,
आंसुओं से भी रहा जो अविचलित,
रक्त देखकर भी
नहीं उबला जिसका रक्त,
तनी मुट्ठियों की विभीषिका से
विरक्त रहकर भी  
वो बढ़ता रहा क्षितिज छूने,   
गौरैया ने विलुप्त कर लिया स्वयं को
अपने नुचे पड़े घोसले के बाहर
क्षत-विक्षत अंडे देखकर,
घरों में घुसी संवेदनहीनता ने
कोयल की आवाज़ भुला दी
और नज़र आने लगी
सैकड़ों काली काली चिड़िया
छत पर , रोशनदान पर
यहाँ तक अन्दर पंखे पर भी,
न जाने कैसी आवाज़ में
कराने लगी झूठा आभास
गौरैया का,
मगर  झूठ के पर कहाँ होते है,
मंदिर में
रगड़ कर भी माथा
नहीं सो पाए तुम पूरी रात  
क्यों ?
खरीदी हुयी नींद भी
कोसों रही दूर,
इस बेचैन शरीर में
मै अब तूम्हारा साथ नहीं दे पाऊँगी,
मै..!  तुम्हारी आत्मा
अपनी पहचान खोने से पहले
तुमसे दूर हो जाऊंगी,
बहुत दूर हो जाऊंगी .

-कुश्वंश


हिंदी में