महेश कुशवंश

17 अक्तूबर 2011

खुला आसमान ......





गमले में
एक पेड़ में मात्र तीन पत्ते
फूल एक भी नहीं
गुच्छों में फूल देख कर लाया  था  उसे
तीन साल से ऐसा ही है
एकदम मरियल
खाद भी समय से 
पानी भी भरपूर
मगर फूल एक भी नहीं 
एक दिन उसे उखाड़ना ही था
उखाड़कर बाहर क्यारी में फेंक दिया
और गमले में गुलाब ने जगह ले ली
अंग्रेजी गुलाब  में पीला फूल
जब झडा तो दूसरा नहीं उगा
अंतराल में  वो गुलाब भी सूख गया
लगभग साल भर बीते 
क्यारी में एक अजीब सा पेड़ 
पत्तियों से  भरा हुआ जंगली सा 
सोचा उखाड़कर फेंक दू 
सोचा चलो हरयाली दे रहा है
यूं ही छोड़ देता हूँ बिना उखाड़े
समय बीता
पेड़ रेंगते हुए खड़ा हो रहा था
फुनगियों पर गुच्ची भर पीले फूल थे
मुझे याद आ गया वो मरियल सा पेड़
गमले में जिसे
तीसरी पत्ती नसीब नहीं थी   
दिन प्रतिदिन मर रहा था  वो 
मर ही गया था लगभग 
उखाड़कर खुले में पहुचा
उसे मिली  
अपनी जमीन
अपना आसमान
गहरे तक जमा ली उसने जड़ें
खुशियों की पत्तियां फैला ली पंखों की तरह
पीले पीले फूल  
बिखेर दिए आने जाने वालों के सर पर  
पेड़ की खुशी देखते ही बनती थी   
उसने  धन्यवाद भी दिया उसको 
जिसने गमले से उखाड़कर 
जड़ें प्रदान की 
और  प्रदान किया विस्तृत आकाश 
समेटने के लिए 
कौन रहना चाहता है  
एक संकुचित गमले में 
जबकि प्रकृति का खुला आसमान  
सबके लिए है .

-कुश्वंश  

23 टिप्‍पणियां:

  1. कौन रहना चाहता है
    एक संकुचित गमले में
    जबकि प्रकृति का खुला आसमान
    सबके लिए है .

    बहुत अर्थपूर्ण बात कही है ..सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  2. कौन रहना चाहता है
    एक संकुचित गमले में
    जबकि प्रकृति का खुला आसमान
    सबके लिए है .

    bahut hi sunder...

    जवाब देंहटाएं
  3. kitni gahree baat hai ye , her kisi ko apne vikaas ke liye vistrit dharti aakash chahiye - bahut hi badhiya

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही गहन चिंतन को प्रेरित करती एक सशक्त आध्यात्मिक प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही अच्छी लगी यह कविता।


    सादर

    जवाब देंहटाएं
  6. कौन रहना चाहता है
    एक संकुचित गमले में
    जबकि प्रकृति का खुला आसमान
    सबके लिए है.

    बहुत गहरी बात है, कोई नहीं रहना चाहता संकुचित दायरे में सिमटकर सभी को चाहिए उड़ने के लिए खुला आसमान और जड़ें ज़माने के लिए विस्तृत जमीन... बहुत सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
  7. कौन रहना चाहता है
    एक संकुचित गमले में
    जबकि प्रकृति का खुला आसमान
    सबके लिए है .

    बहुत गहरी मगर सच से ओत-प्रोत बात कह दी।

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

    बधाई स्वीकारें ||

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत ही गहन चिंतन को अभिव्यक्त करती सशक्त रचना..

    जवाब देंहटाएं
  10. एक छोटी सी अभिव्यक्ति में कितनी गहरी बात कितनी सरलता से कह दी आपने बहुत खूब शानदार अभिव्यक्ति....
    समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/10/blog-post_18.html

    जवाब देंहटाएं
  11. इस भाव पूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें

    जवाब देंहटाएं
  12. 'तीसरी पत्ती नसीब नहीं थी'

    शब्दों को कुशलता से बुनते हैं आप। बहुत बहुत बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  13. सक्स्ह कहा ... सभी उन्मुक्त जीवन चाहते अहिं प्रकृति के बीच ... पर इंसान चाहता है क्या ये आज ...

    जवाब देंहटाएं
  14. बहुत ही सुन्दर रचना है ..
    लाजवाब

    जवाब देंहटाएं
  15. कौन रहना चाहता है
    एक संकुचित गमले में
    जबकि प्रकृति का खुला आसमान
    सबके लिए है .

    ...बहुत गहरी बात इतनी सरलता और प्रभावी ढंग से कह दी...लाज़वाब प्रस्तुति..

    जवाब देंहटाएं
  16. खुला आसमान सभी के लिए प्राप्य हो!
    सुन्दर कविता!

    जवाब देंहटाएं
  17. darshanik see soch...

    कौन रहना चाहता है
    एक संकुचित गमले में
    जबकि प्रकृति का खुला आसमान
    सबके लिए है.

    sach hai apni prakriti ke viruddh jivan ka prasaar nahin hota. saargarbhit rachna ke liye badhaai.

    जवाब देंहटाएं
  18. ab yeh bonsai ke shaukeenon ko kaun samkhaye !
    sunder rachna !
    badhai !

    जवाब देंहटाएं
  19. ab yeh bonsai ke shaukeenon ko kaun samjhaye !
    sunder rachna !
    badhai !

    जवाब देंहटाएं
  20. khula asman chahna sabhi ki kismat nahi hoti pr jisko milega vo ghutan me nahi rahna chaega
    rachana

    जवाब देंहटाएं
  21. हां, प्रकृति का खुला आसमान सब के लिए है।
    सुंदर कविता, सुंदर भाव।

    जवाब देंहटाएं

आपके आने का धन्यवाद.आपके बेबाक उदगार कलम को शक्ति प्रदान करेंगे.
-कुश्वंश

हिंदी में