15 अक्तूबर 2011

चाँद.तुम भी..




चाँद
तुम भी एक स्त्री को
स्त्री न रहने देने के
गुनाहगार हो
तुम्हारा नाम देकर
बूँद बूँद को तरसाया जाता है
त्याग और परम्पराओं के नाम पर
और जब भी कोई
दम तोड़ देती है  निर्जला
महिमामंडित कर
आरोहित कर दिया जाता है स्वर्ग
और बना दी जाती है देवी
ये त्याग कोई पुरुष क्यों नहीं करता
स्त्रियों के लिए
सिर्फ आधे दिन के लिए  ही
पानी छोड़ कर दिखाए
त्याग सिर्फ स्त्रियों के लिए ही क्यों ?
दुआए तो दोनों को मांगनी चाहिए
एक दुसरे के जीवन की
क्योकि साथ तो 
दोनों को ही  चाहिए  
एक दुसरे का 
पति के लम्बे जीवन के लिए  
पानी की बूँद केलिए चाँद की प्रतीक्षा 
एक दंड है जो 
जेहन में बैठे डर को पोषित करता है  
और एक शरीर 
उसकी भरपाई के लिए  
करता है लंबा इंतज़ार 
कभी न ख़त्म होने वाला इंतज़ार  
एक पूरे समाज के प्रति ये  
अमानवीयता बंद होनी चाहिए  
और खोज लेने चाहिए दुसरे तरीके 
पति की लम्बी उम्र के लिए  
पति और पत्नी को मिलजुलकर 
आँखों में  बरस रहे प्यार और सम्मान  
से बढ़ कर  कोई लम्बी उम्र  नहीं होती कारगर
पानी की बूँद के बिना तिल तिल त्याग कर 
उम्र लम्बी नहीं होती 
आक्रोश को जन्म देती है 
और याद दिलाती है  
सदियों से  थोपी हुयी मजबूरी 
जो सिर्फ स्त्री भोगती है   
करवा चौथ के दिन .

-कुश्वंश  

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