14 अक्तूबर 2011

वही.. मधुप-मधु !










जब कभी भी
पलट जाते है
जिन्दगी के पन्ने
आ जाती है  खुशबू
भीनी भीनी
वो, 
जो तुम्हें सबसे अलग करती थी
मह्शूश होने लगती है
वही
रेशम सी  कोमल
स्पर्श की  सिहरन
और मैं पहुच जाता हूँ
उस पड़ाव  पर
जहाँ से प्यार के सारे रास्ते
स्पस्ट नज़र आने लगते है
खुलने लगते है 
बहुत  से क्षितिज
प्यार के
मनुहार के
तुम्हारे मुह फेरने के
भाग कर , पास आने के
परदे की ओट से मुस्कुराने के 
तुम्हारे स्कूल के  सामने इंतज़ार के
शहर के दुसरे कोने में
बने पार्क की बेंच में
धुंधलके में भी  कुछ और ठहर जाने के
और आज जब तुम
यही आस-पास बिखेरती हो
प्यार की सरिता
अभावों की गर्दिश से  निकलकर
सम्रद्धि  के  सागर में
सम्पन्नता के
तारों भरे आकाश में  भी 
वो खुशबू क्यों नहीं मिलती
जो
कभी कभी 
मिल जाती है  
अपने ही अंतस में 
वो संगीत क्यों नहीं बजता
जिससे सिहर उठता था रोम-रोम
आओ एक बार फिर तलाश लें
वही  जमीन
वही तारों भरा आकाश 
वही चाँद सितारे तोड़ लाने की बात
वही अपनी ही श्वांशों  से अन्विज्ञ
संभावना संसार
वही मधुप-मधु
क्यों ? ठीक है  ना ....

-कुश्वंश

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