3 सितंबर 2011

उल्टी गंगा के देश में

                                   हमने कोई 
बड़ी बात की गुजारिस नहीं की 
ना ही कोई 
ना हो सकने वाली बात 
हमने तो सामने ला दी वो 
जो 
तुम्हारे मन में छिपी बैठी थी
सदियों से 
और तुम लाचार 
कभी रिश्तों से
कभी रिश्तों को निबाहने की कशमकश से
स्वयं पर चढाते रहे 
मुखौटे दर मुखौटे
और जब  बदरंग हो गयी तुम्हारी पहचान 
तो तलासने लगे 
इसका-उसका कंधा 
जिसके आगोश में सर रखकर रो सको
ऐसे कि
सिसकियाँ भी सुन न सके कोई
आखिर तुम्हे मिल गया कंधा
और उस कंधे  को तुमने 
नदी बना डाला 
जिसका कोई बाँध ही न हो
ये जानते हुए कि
ये नदी बहती है उल्टी 
इसका नहीं है कोई भी समुद्र 
फिर भी तुमने भरोसा किया 
काश तुम्हारा भरोसा
तुम्हारे अंतर्मन की
परिणति हो
तुम्हारे हर संकल्प की
सद्गति हो.

-कुश्वंश 


(चित्र गूगल से साभार )


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