20 जुलाई 2011

मेरा.... धर्म,जाति, आत्मा



कल सड़क पर
मूसलाधार बारिश में
चिंदी - चिंदी हुए कपड़ों में
इधर-उधर बिखरे
इंसानी अंग प्रत्यंग देखकर
मर गया
मेरा धर्म...
हजारों सहमे, बदहवास और
निचुड़ चुके रक्त से आभासी चेहरे 
फटी ऑंखें लिए गिरते पड़ते
प्रियजनों को तलाशते
मासूमों, निर्दोषों को देखकर
अपग हो गयी
मेरी जाति...
जली-अधजली झुलसी
नन्ही-नन्ही उँगलियाँ
उँगलियों को सीने से चिपकाता 
चीत्कार करता मातृत्व
सुहाग के रक्त सजा वैधव्य देखकर
नस्ट हो गयी
कभी न नस्ट होने वाली
" आत्मा "
और एक आत्माहीन से
कोई क्या अपेक्षायें कर सकता है ?
कितनी अपेक्षायें कर सकता है
तुम्ही बताओ ..


-कुश्वंश

हिंदी में