12 जुलाई 2011

कैक्टस कौन ?


उधर जलता रहा
मेरे पड़ोसी का घर
मैं
मानवगंध और सड़ांध से नाक दबाता
होता रहा
घटना से विमुख
सींचता रहा
अपने गमले
उस तरफ
नोंचते रहे
एक युवती को
हैवानियत ओढ़े कुत्ते
मैं
अपने ड्राइंग रूम में टहलता रहा
कुछ और हुए पाशविक उत्सव चारो तरफ
हलाक कर दिए गए
कई विधर्मी
मै घुट-घुट पीता रहा पानी
चाय की चुस्कियों की तरह
कालांतर में हुआ सरकारी उत्सव
पारिवारिक सांत्वना
मुआवजा
टोपियों के घडियाली आंशू
झख मारकर सब कुछ हुआ शांत
मेरी संवेदना लौटी
पोर्च में करीने से सजे कैक्टस को
मैं पिछवाड़े फेंक आया
और घोषित कर दिया
कैक्टस को ही
सारे फसाद की जड़ .

-कुश्वंश

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