महेश कुशवंश

12 जुलाई 2011

कैक्टस कौन ?


उधर जलता रहा
मेरे पड़ोसी का घर
मैं
मानवगंध और सड़ांध से नाक दबाता
होता रहा
घटना से विमुख
सींचता रहा
अपने गमले
उस तरफ
नोंचते रहे
एक युवती को
हैवानियत ओढ़े कुत्ते
मैं
अपने ड्राइंग रूम में टहलता रहा
कुछ और हुए पाशविक उत्सव चारो तरफ
हलाक कर दिए गए
कई विधर्मी
मै घुट-घुट पीता रहा पानी
चाय की चुस्कियों की तरह
कालांतर में हुआ सरकारी उत्सव
पारिवारिक सांत्वना
मुआवजा
टोपियों के घडियाली आंशू
झख मारकर सब कुछ हुआ शांत
मेरी संवेदना लौटी
पोर्च में करीने से सजे कैक्टस को
मैं पिछवाड़े फेंक आया
और घोषित कर दिया
कैक्टस को ही
सारे फसाद की जड़ .

-कुश्वंश

25 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

    जवाब देंहटाएं
  2. यही बुरा समय हम लोग भोग रहे हैं ! शायद आज जानवर भी मानव से अधिक संवेदनशील है ...
    और आवश्यकता के समय, हम नपुंसक लोग, शीशे के आगे खड़े होकर अपना बाहुबल तौलते रहते हैं :-(
    शुभकामनायें आपको !

    जवाब देंहटाएं
  3. हालाक कर दिए गए कई विधर्मी
    मै घुट-घुट पीता रहा पानी
    चाय की चुस्कियों की तरह
    कालांतर में हुआ सरकारी उत्सव
    पारिवारिक सांत्वना, मुआवजा
    टोपियों के घडियाली आंशू

    कविता के माध्यम से बहुत गहरी बात कह रहे हैं सर.

    सादर

    जवाब देंहटाएं
  4. गहन भावों का समावेश ...।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत गहन बात कही है ..दोष हमेशा दूसरों पर दे दिया जाता है ...

    जवाब देंहटाएं
  6. This is a piece of brilliant writing..
    It looks so absurd that level of humanity is getting degraded day by day !!

    जवाब देंहटाएं
  7. इन्सान की यही उदासीनता इंसानियत को ख़त्म किये जा रही है .
    सही आत्म निरिक्षण किया है .

    जवाब देंहटाएं
  8. सभी सुधी जनों का हृदय से आभारी, कविता की आत्मा तक पहुचकर विचार रखने के लिए सभी को व्यक्तिगत धन्यवाद. अपनी शक्ति प्रदान करते रहें -कुश्वंश

    जवाब देंहटाएं
  9. मेरी संवेदना लौटी
    पोर्च में करीने से सजे कैक्टस को
    मैं पिछवाड़े फेंक आया
    और घोषित कर दिया
    कैक्टस को ही
    सारे फसाद की जड़ .

    आंतरिक पीड़ा की सहज अभिव्यक्ति...

    जवाब देंहटाएं
  10. आधुनिक जीवन शैली पर सम्वेदनशील और प्रतीतात्मक अभिव्यक्ति.

    जवाब देंहटाएं
  11. आज के समाज का वास्तविक चित्रण...बधाई !

    जवाब देंहटाएं
  12. Kushvansh ji der se padhne ke liye sorry.aapki kavita ne to andar tak jhakjhor kar rakh diya bahut achcha kataksh likha hai aankhon ke saamne ek barbarta aur doosri aur tamashbeenon aur kuch majbooriyon ka najara saamne aa gaya.last ki linon ne kavita ka saar poorntah spasht kar diya.aapko bahut bahut badhaai.

    जवाब देंहटाएं
  13. A soul stirring creation !...It's painful to see the growing insensitive lot around.

    जवाब देंहटाएं
  14. दिल को झकझोरने वाली कविता !

    जवाब देंहटाएं
  15. सच कहूँ तो इतने सारे शब्द गद्दमद्द हुआ पड़ा है अन्दर कि उसमे से सलीके से बहार निकाल क्या कहूँ, समझ नहीं पड़ रहा...

    दुखी मन थोडा और बोझिल हो गया आपकी इस रचना को पढ़...

    संवेदनहीनता की हद है और जब संवेदनशीलता दिखाने की जबरिया कोशिश होती है तो इसी तरह से दिखाई जाती है, सारे फसाद की जड़ गमले में लगे कैक्टस को पिछवाड़े फेंककर...

    इस सार्थक रचना के लिए साधुवाद आपका..

    जवाब देंहटाएं
  16. दिल को झकझोरने वाली कविता ! सार्थक रचना

    जवाब देंहटाएं
  17. kbhi kbhi gulab ki kyari pr ek kaktas ka poudha bhari pd jata hai . kya hi achchha ho hhm kaktas ka poudha ugaye hi na apne aangn me . km se km gmla fekne ke vishad se to hum apneaap ko bcha le jayenge .

    जवाब देंहटाएं
  18. सदैव की तरह मन को उद्वेलित करती एक संवेदनशील प्रस्तुति..बहुत सार्थक प्रस्तुति..

    जवाब देंहटाएं
  19. पोर्च में करीने से सजे कैक्टस को
    मैं पिछवाड़े फेंक आया
    और घोषित कर दिया
    कैक्टस को ही
    सारे फसाद की जड़ .

    कैक्टस के माध्यम से बहुत गहरी बात कह दी है आपने... वर्तमान परिस्थितियों का वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करती रचना...

    जवाब देंहटाएं
  20. कालांतर में हुआ सरकारी उत्सव
    पारिवारिक सांत्वना
    मुआवजा
    टोपियों के घडियाली आंशू
    झख मारकर सब कुछ हुआ शांत


    वर्तमान दशा का सटीक आकलन....

    जवाब देंहटाएं
  21. मैं पिछवाड़े फेंक आया
    और घोषित कर दिया
    कैक्टस को ही
    सारे फसाद की जड़ .
    सम्वेदनशील और प्रतीतात्मक पीड़ा की सहज अभिव्यक्ति....

    जवाब देंहटाएं

आपके आने का धन्यवाद.आपके बेबाक उदगार कलम को शक्ति प्रदान करेंगे.
-कुश्वंश

हिंदी में