5 जुलाई 2011

समाधान की खोज !


न जाने कहाँ से उछलकर
एक पत्थर
मेरे माथे पर लगा
मुझे लहूलुहान कर गया
मैंने दूर तक देखा
पत्थर कहाँ से आया
समझ ही नहीं पाया
सड़क पर पड़े उस लावारिस
पत्थर के सिवा
मुझे कुछ नज़र नहीं आया
माथे पर चुहचुहा आये रक्त को भूलकर
मैं  जानना चाहता था
उस सजा का अपराध
तभी दूर दिखे
झाडिओं में छिपने का असफल प्रयास करते
कुछ बच्चे
जैसे ही मैंने उन्हें
खोज लिए जाने का संकेत दिया
वे न डरे , न सहमे
झट  से सामने आ गए
और
हमारे पूछने से पहले ही बोल उठे
हमने पत्थर मारा
हमने सोचा आप भिखारी है
वोट मांगने वाले
कुछ सालों पहले आये थे
और कैसे गिडगिडाये थे
उसके बाद आप नहीं मिले
हमारे घर जले
धरती कांपी
बाढ़ में बह गए हमारे बापू
आप कुर्सी से नहीं हिले
हम चीखते रहे तख्तियां लेकर
आप हमारे साथ नहीं चले
इसीलिये हमने पत्थर चलाये हैं
मै खुश था आश्वस्त भी
भावी पीढी समाधान की खोज में है
इसी प्रफुल्लित सोच ने
मेरा पत्थर से आहत होना
भुला दिया था .

-कुश्वंश
 

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