3 जुलाई 2011

रक्तबीज

मैं जानता हूँ,
तुम भी जानते हो
उस आदमी को,
जो न कभी चैन से सो सका,
न सही अर्थों में
जागते देखा गया,
ईर्ष्या के अंगारे
झुलसाते रहे उसे
दिन प्रतिदिन,
खिडकियों से झांककर उसने
ओढ़नी चाही सम्रधता,
इसी कुत्सित प्रयास में  
न जाने कितनी बार
चादर से निकल गए उसके पाव,
वो क्या है ?
न उसने कभी सोचा,
ना जाना-समझा,
कल रात वो सो गया
चिर निद्रा मैं,
और वही लोग
जिनके प्रति वो सदैव से विरक्त था ,
ईर्स्यालू था,
कंधे पर उठाकर
अग्नि को समर्पित कर आये,  
बिना कोई देर लगाये ,
इस भय से
कही वो फिर न जीवित हो जाये,
मगर अग्नि को समर्पित उसकी देह
धुएं में परिवर्तित होने से पहले
अट्टहास करने लगी ,
मानों  कह रही हो
मै रक्तबीज हूँ
कभी नहीं मारूंगा,
झाँक कर देखो  
तुम्हारे बीच फिर उग आया हूँ ,
सच कहा उसने,
रक्तबीज मर सकता है क्या ?

-कुश्वंश

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