28 जून 2011

वाचक जी नहीं रहे

वाचक जी नहीं रहे
मार्निंग वाक् से लौटे
और चाय भी नहीं पी पाए 
अभी तो रिटायर हुए थे
दो साल भी नहीं चल पाए 
आस पास कोई नहीं था
पत्नी सीने पर चूड़ियाँ  ही  तोड़ रही थीं
दरवाजे पर पडोसी आते  जा रहे थे 
बेटा हैदराबाद से आयेगा
आसपास के परिवार वाले
आने वाले है
अर्थी कौन उठाएगा
प्रश्न  हवा में तैर रहा था 
भीड़ बढ़  रही थी
शर्माजी भीड़ को चाय पिलाने लगे
आफिश के भूले  बिसरे दिखाई देने लगे थे 
रोते पीटते दूर के घरवाले आ गए थे 
निर्णय हुआ
जल्दी ले चलो
कोई नहीं आ  पायेगा
मोहन ग़मगीन था 
बिल्डिंग मटेरिअल का बीस हज़ार बाकी था
बिना चुकाए चल दिए 
दद्दा बोले दस तो  कल हमसे लाये थे 
परसों देने का वादा था 
आज ही चले गए 
राम नाम सत्य है  
भीड़ मंदिर तक साथ चली 
फिर तितर बितर हो ली
वर्मा जी  जल्दी   में   थे 
बिहारी जी आप चले.... कह कर खिसक लिए 
कुछ मुरझाये चेहरे गंगा घाट तो   गए  
दूर  तखत पर बैठ गए रामदेव-अन्ना बतियाते रहे  
यही सत्य है  
बाकी सब असत्य 
पण्डे ,पुजारी, लकड़ी वालों के  चेहरे  खिले थे 
आज लाशें जी ज्यादा हो गयी थी 
आज अच्छी छनेगी
महीनों का सूखा हटेगा   बिरयानी बनेगी
वाचक जी धुवां हो गए थे 
सब ने नीम चबाये और 
जम के पड़े खाए 
खाए जाते है ना ....... 
दूर के  घरवाले  चौराहे  से  ही घर चले गए 
देर  जो हो रही थी
रात घिर आयी
काम करने वाली अम्मा  सबसे बाद में गयी
वाचक की पत्नी को सहलाती रही   
किसी ने  दरवाजे पर आटे का दिया जला दिया   
और सन्नाटा पसरे घर के बरामदे में बैठ गयी  अर्धांगिनी... अधूरी
बिजली चली गयी  रात   भर के लिए 
वाचक  जल रहे थे दिया बनकर
वाचक की पत्नी  लौ से अब भी आस   लगाये थी 
शायद वो लौट आयें
मगर झूठे निकले तुम भी 
कहते थे  तुम्हारा साथ  निबाहूंगा  
खूब साथ निभाया
तुम भी तो अपने ही हो न
क्या साथ   नाबहोगे ?
बस बहाने बनाओगे 
और आधे रस्ते से  घर निकल जाओगे  .

- कुश्वंश  



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