26 जून 2011

सत्यम अप्रियम

कल रात मेरे पीछे लग गया सत्य,  
सत्यासंवाद की गोष्ठी में   
सत्य पर पुरजोर वकालत का   
कुछ और ही अर्थ निकाल लिया उसने,
मैंने पूंछा क्यों भाई 
गाँधी जी को छोड़ 
मेरे पीछे क्यों पड़े हो, 
सिर्फ मुझे सुधारने  में क्यों अड़े हो,  
माना सत्य मेरी जबान में है, 
मगर असत्य के इस जंगल में ,
सत्य,  
बस तीर-कमान में है, 
जब चाहो, जिसपर चाहो  चला दो
और मीडिया बनकर तमाशा देखो,  
सत्य पर   असत्य को जूझने दो, 
सत्य को एक और झूठ और
असत्य को एक और राह मिलने दो,
इसे जानते हो न
सत्यम ब्रूयात ,प्रियं ब्रूयात 
न ब्रूयात   सत्यम अप्रियम, 
आज कल जो भी सत्य है,  
अप्रिय है,
इसी लिए नहीं बोलता कोई अप्रिय सत्य, 
मेरे दोस्त ! सत्य 
तुम्हारा  भरकस प्रयास  निरर्थक जायेगा
कोई कितना भी करे कोशिश
आसानी से बस  झूठ ही बोल पायेगा
सिर्फ झूठ ही बोल पायेगा 
मैंने बोल भी दिया तो  
क्या अकेला चना भाड़ फोड़ पायेगा  ?
बेचारा  चना ! 
किसी सुरक्षित जगह में भी
आत्महत्या की मौत मारा जायेगा,
और
चीखता रह जायेगा  सत्य  गलियों में,  
असत्य  फिर बच के निकल जायेगा,
सत्य !  
तुम जाओ मुझे छोड़ो , 
पेड़ पर  किसी ऊंची फुनगी पर बैठो 
असत्य का टी- ट्वेंटी  देखो 
या फिर सरकारी दफ्तर में जाओ   
गाँधी जी की फ्रेम लगी  मिलेगी फोटो 
उसमे चिपको
जहाँ  सदियों से चिपके हो तुम .
और इंतज़ार करो युग बदलने का 
शायद बदल जाये ?

-कुश्वंश  



    



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