24 जून 2011

बृहद सन्दर्भ लेती भूंख

भूंख
शब्द छोटा सा है किन्तु
ब्रम्हांड में
बृहद सन्दर्भ लिए
कोई शब्द  इसके समकक्ष  नहीं,
पेट के लिए 
यही दो शब्द 
देश चाक कर देते है, 
और निकाल लेते है  अंतड़ियाँ तक अपनों की , 
तुम्हारी हमसे बड़ी है क्या ?
और इस  बड़ी भूंख का 
कोई छोटा  उत्तर नहीं,
सभी उत्तर बड़े
देश ,जाति और सभ्यता नस्ट करने वाले ,
तुम्हारी हमसे सफ़ेद क्यों?
का कुंठित प्रश्न
काली कर देता  है 
सदियों से पोषित सभ्य संस्कृति,
और हम नहाने लगते है 
कालिख से,कीचड से
और फेकने लगते है इसपर-उसपर,
शरीर की निर्भीक भूंख 
पारदर्शी होने लगती है 
और जलाने लगती है   
दबे छिपे अरमानों की होली 
सरे आम मंच पर,
छद्म जाग्रति  के नाम पर  प्रतिकार स्वरुप
यही  जागरण  
जला देता   है
पूरा  घर, परिवार, समाज
यही क्षणिक भूंख
छीन लेती है ताज और तख़्त भी और
नोंच लेती है चेहरे सरे आम  
बिना पल भर गवाए , 
भाग कर  यही भूंख  बदल लेती है आकार, 
हो  जाती है   अमीबा, 
कागज़ के छोटे-बड़े टुकड़े,
खनकते दुर्लभ धातु  के सिक्के ,
एकत्रित होते ही   
भूंखे    होने लगते है खुश  
जानते हुए भी की
भूंख  ज्यादा हो तो
बदल देती है 
श्वांश लेते  शरीर का आकार 
और बड़ा,और बड़ा
फट जाने की हद तक बड़ा 
फूटते ही  निराकार, निर्जीव   शरीर का फुग्गा  
नहीं रहती  कोई भूख 
काश ! 
हम भूंख   को  सिर्फ पेट तक ही सीमित रहने देते
और भरने देते उद्दयम से 
सबके पेट.

-कुश्वंश  


हिंदी में